Gopal Gupta

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हो रही है

सियासत ही ..सियासत हो रही है ,
अंधेरों की .....वकालत हो रही है,,

हमी ने सर पे ...तिरपाले थी तानी,
हमी से उस को नफ़रत हो रही है,,

हवा इस दौर में ..ऐसी चली की,
हवाओं से ..हिफाज़त हो रही है,,

गज़ब अंदाज़.. चाहत का ये देखे,
मिरी मुझ से. शकायत हो रही है,,

ग़ज़ल को कुछ नया उनवान लाओ,
कलम की क्यों  फ़ज़ीहत हो रही है,,

ऐ मुझ को भूलने ...वाले सदा सुन,
फ़क़त तेरी ......जरूरत हो रही है,,

शरारे भर गये .........सारे बदन में,
अदा यूं ..रस्म ए उलफ़त हो रही है,,

अमन के वास्ते ....गोपाल लिखना,
ग़ज़ल की गर   रिवायत हो रही है,,

Gopal Gupta "Gopal "

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2 Comments

kashish

04-Jun-2023 05:10 PM

very nice

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Shahana Parveen

04-Jun-2023 05:07 PM

बहुत सुंदर सृजन 👌👌🎉

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